किस्सा कहानी - 5 में एक बार फिर साहित्य प्रेमियों ने कहानी का पाठ सुना, कहानी के घटनाक्रमों के साथ अपने भावों से साहित्यकारों ने मिलाया ताल


- पारस कहानी के द्वारा समाज के सच्चे परिदृश्य के खींचे चित्र

-E नागरी प्रचारिणी सभा आगरा के पुस्तकालय भवन में किस्सा कहानी-5 कार्यक्रम का हुआ आयोजन, नवीन कुमार नैथानी की कहानी 'पारस' का खुद लेखक ने किया प्रभावशाली कथापाठ


आगरा। "सुनैना की चीख सौरी में सबसे पहले पुुरना दाई ने सुनी थी। पुरना सुनती नहीं थी उन दिनों। शंकालुओं ने तर्क किया। अरे ! जब तक देह है, तब तक मन है।’’ सौरी के होने पर अगाध विश्वास रखने वालों ने कहा,’’ इन्द्रियाँ देह का साथ छोड़ सकती है, मन का नहीं। पुरना दाई ने स्वप्न में प्रसव-पीड़ा से कराहती सुनैना को देखा और पानी की धारा की तरफ दौडीं। पुरना के पीछे पूनो देवी थीं। सौरी के लोगों ने पूनो देवी से जाना कि पानी की धारा के पास सुनैना ने एक कन्या को जन्म दिया...!" यह अंश था नवीन कुमार नैथानी की कहानी पारस का, जिसका खुद उनके द्वारा ही प्रभावशाली ढंग से कथा पाठ किया गया।

किस्सा कहानी के अंक 5 में एक बार फिर साहित्य प्रेमियों ने कहानी का पाठ सुना, कहानी के घटनाक्रमों के साथ अपने भावों से ताल मिलाते रहे, कहानी पाठ का सिलसिला जैसे-जैसे आगे बढ़ा, श्रोताओं की उत्सुकता बढ़ती गई। रोचकता और रोमांच ने श्रोताओं को बांधे रखा। नागरी प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय भवन में आगरा की सांस्कृतिक संस्था रंगलीला और कहानी की पत्रिका कथादेश द्वारा शुरू किया गया आयोजन सफलतापूर्वक आगे बढ़ा। भारतीय कहानीकारों का कथा पाठ एवं चर्चा मंच किस्सा कहानी-5 एसिड हमलों की शिकार महिलाओं के संगठन शिरोज़ हैंगआउट का आयोजन था। आतिथ्य नागरी प्रचारिणी सभा का रहा। शुरुआत में संयोजक अनिल शुक्ल ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर संक्षिप्त प्रकाश डाला।

आलोचक प्रियम अंकित ने नवीन कुमार नैथानी के रचना संसार पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा पारस कहानी केवल कहानी नहीं बल्कि लोकोक्तियों की कथा कहने की पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, ये समाज में स्त्री की उपेक्षा के सवाल को भी नए संदर्भों में उजागर करती है। 

मुख्य अतिथि प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि, "इस कहानी में एक कन्या की आकांक्षा का मतलब हमें साफ समझ में आ जाता है कि घर में एक कन्या के आने से एक रौनक आ जाती है, क्योंकि घर में कन्याओं के आगमन से विकास की आस पूरी होती है।"

मुख्य वक्ता अरुण डंग ने कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि कहानी के साथ किस्सा को भी जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है, किस्से परंपरागत रूप से लोगों द्वारा सुनाए जाते हैं और वे यूं आगे बढ़ते चले जाते हैं। साथ ही कहा कहानी बड़ी थी, मशविरा दिया कि कार्यक्रम के लिए आगे से उस कहानी का चयन करना चाहिए़ जो छोटी हो।"

विशिष्ट अतिथि हरविजय वाहिया ने कहा "मैं जब कीनिया में स्टूडेंट था, तब मैंने पहली कहानी 1970 में लिखी थी। 1975 में पहला नाटक लिखा था, जिसको राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। लिखना मेरा शौक है, करीब 100 कहानियों को मैंने लिखा है। इनको पुस्तक के रूप में प्रकाशित करूंगा। पांच साल पहले मुझे ब्रेन स्ट्रोक हुआ तो कुदरत के करीब जाना पड़ा, वाइल्ड लाइफ पर कई किताबें लिख चुका हूं। सबको लिखना चाहिए। सबके पास अपने अनुभव हैं, इनको पन्नों पर उतरना चाहिए़।"


शक्ति प्रकाश ने कहानी की समीक्षा करते हुए कहा, "कहानी में महिलाओं की महत्ता को व्यक्त किया गया है। इस कहानी में क्या हुआ से ज्यादा, लोग क्या मानते हैं, पर ज्यादा केंद्रित है।" 

चर्चा में अमीर अहमद जाफरी, डीईआई के ब्रज राज सिंह, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुरेंद्र सिंह, युवा कवियत्री वंदना तिवारी आदि ने हिस्सा लिया। मंचासीन कार्यक्रम अध्यक्ष हरि नारायण, विशिष्ट अतिथियों नवीन कुमार नैथानी, प्रो.रामवीर सिंह, हर विजय सिंह वाहिया का स्वागत शक्ति प्रकाश, रामभरत उपाध्याय, अमीर अहमद एडवोकेट, डॉ. महेश धाकड़ ने किया। इस कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन प्रो. नसरीन बेगम ने किया। कथाकार अर्जुन सावेदिया ने धन्यवाद दिया। कार्यक्रम में नीरज जैन, संजय गुप्त, राजीव सिंघल, शलभ भारती, डॉ. ज्योति खंडेलवाल, अभिनय प्रसाद, राजीव सिंह, संदीप अरोरा, रिमझिम सचदेवा, मन्नू शर्मा, अर्निका माहेश्वरी आदि शामिल थे।

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